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Monday, July 20, 2009

आज का प्रण...

आज फिर तुने प्रण किया है -
" झूठ नहीं बोलूँगा, मन से पढूंगा
माँ-पिता के सपनोंको साकार करूँगा
जग मैं अपना नाम करूँगा "
लेकिन,
ज़रा ठहरो तो -
उस प्रण का क्या जो पिछले इतवार किया था ?
और न जाने ऐसे ही कितनी बार किया था !
"अरे हाँ उस प्रण पर सोमवार को अमल किया था न !"
पर आज तो बुधवार है ना !

आज-कल तो किस्सा ही यही है-
रात मैं प्रण, प्रातः विस्मरण !
"कल से करूँगा !"
'कल'- जो कभी आया नहीं और न आएगा
अतः प्रण कभी पूरा होगा नहीं !

वैसे आज क्या कर रहे हो ?
"बुधवार के प्रण पर अमल करने का
प्रण कर रहा हूँ !?"

डॉ विराट
इंदिरा गाँधी आयुर्विज्ञान संसथान
शिमला, हिमाचल

यादों में...

यादों में... (Written BY my MOTHER in loving memory of my FATHER) "कभी सोचा न था, दिन ऐसे भी आएँगे.. जो समझती थी खुद को रानी, वो यूँ ...